सम्पूर्ण स्तोत्र एवं चालीसा संग्रह (Stotram & Chalisa)
माँ भगवती दुर्गा का महाकल्याणकारी श्री अर्गला स्तोत्रम्, गोस्वामी तुलसीदास विरचित संकटमोचन श्री हनुमान चालीसा एवं भगवान भोलेनाथ की पावन शिव चालीसा। शुद्ध संस्कृत श्लोक, चौपाई एवं प्रत्येक पद का सरल हिन्दी अर्थ।
श्री अर्गला स्तोत्रम् (Argala Stotram)
"दुर्गा सप्तशती का परम फलदायी स्तोत्र: "रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि""
ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः॥
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥
हिन्दी भावार्थ: जयन्ती, मङ्गला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा: इन नामों से प्रसिद्ध जगदम्बिके! आपको मेरा सादर प्रणाम है।
जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणी। जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥
हिन्दी भावार्थ: हे देवि चामुण्डे! आपकी जय हो। हे समस्त प्राणियों की पीड़ा हरने वाली! आपकी जय हो। हे सबमें व्याप्त रहने वाली देवि! आपकी जय हो। हे कालरात्रि! आपको मेरा नमस्कार है।
मधुकैटभविद्रावि विधातृवरदे नमः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हिन्दी भावार्थ: मधु और कैटभ को परास्त करने वाली तथा ब्रह्माजी को वरदान देने वाली हे देवि! आपको नमस्कार है। आप मुझे दिव्य आत्म-स्वरूप दीजिए, विजय दीजिए, यश दीजिए और मेरे काम-क्रोध आदि कामुक शत्रुओं का नाश कीजिए।
महिषासुरनिर्णDefaultाशि भक्तानां सुखदे नमः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हिन्दी भावार्थ: महिषासुर का संहार करने वाली तथा भक्तों को परम सुख प्रदान करने वाली हे देवि! आपको प्रणाम है। मुझे रूप दीजिए, जय दीजिए, यश दीजिए और शत्रुओं का नाश कीजिए।
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हिन्दी भावार्थ: रक्तबीज का वध करने वाली और चण्ड-मुण्ड का संहार करने वाली हे देवि! मुझे रूप दीजिए, विजय दीजिए, यश दीजिए और शत्रुओं का शमन कीजिए।
शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हिन्दी भावार्थ: शुम्भ, निशुम्भ और धूम्रलोचन का मर्दन करने वाली हे भगवती! मुझे रूप दीजिए, विजय दीजिए, यश दीजिए और काम-क्रोध रूपी शत्रुओं का संहार कीजिए।
वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हिन्दी भावार्थ: सबके द्वारा पूजित चरणों वाली और समस्त सौभाग्य प्रदान करने वाली हे देवि! मुझे रूप दीजिए, जय दीजिए, यश दीजिए और शत्रुओं का नाश कीजिए।
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हिन्दी भावार्थ: अचिन्त्य रूप और अद्भुत चरित्र वाली, सब शत्रुओं का नाश करने वाली हे देवि! मुझे आत्म-ज्ञान का रूप दीजिए, विजय दीजिए, यश दीजिए और शत्रुओं का शमन कीजिए।
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हिन्दी भावार्थ: भक्तिपूर्वक नतमस्तक होने वाले भक्तों के पापों को हरने वाली हे चण्डिके! मुझे रूप, विजय, यश प्रदान कर समस्त आंतरिक-बाह्य शत्रुओं का नाश कीजिए।
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हिन्दी भावार्थ: भक्तिपूर्वक स्तुति करने वाले भक्तों के समस्त शारीरिक व मानसिक रोगों का नाश करने वाली हे चण्डिके! मुझे रूप दीजिए, जय दीजिए, यश दीजिए और शत्रुओं का नाश कीजिए।
चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हिन्दी भावार्थ: हे चण्डिके! जो लोग इस संसार में निरंतर भक्तिभाव से आपकी अर्चना करते हैं, उन्हें रूप दीजिए, जय दीजिए, यश दीजिए और उनके शत्रुओं का नाश कीजिए।
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हिन्दी भावार्थ: मुझे सौभाग्य और आरोग्य दीजिए। मुझे परम सुख और मोक्ष दीजिए। मुझे रूप दीजिए, जय दीजिए, यश दीजिए और मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए।
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हिन्दी भावार्थ: मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए, मुझे अत्यधिक शारीरिक व आत्मिक बल दीजिए। मुझे रूप दीजिए, जय दीजिए, यश दीजिए और शत्रुओं का नाश कीजिए।
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हिन्दी भावार्थ: हे देवि! मेरा कल्याण कीजिए। मुझे परम ऐश्वर्य और लक्ष्मी प्रदान कीजिए। मुझे रूप दीजिए, जय दीजिए, यश दीजिए और शत्रुओं का शमन कीजिए।
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
हिन्दी भावार्थ: देवताओं और असुरों के मुकुटों की मणियों से घिसे हुए पावन चरणों वाली हे अम्बिके! मुझे रूप दीजिए, जय दीजिए, यश दीजिए और शत्रुओं का नाश कीजिए।
भार्यां मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्। तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥
हिन्दी भावार्थ: हे जगदम्बिके! मुझे मनोनुकूल चलने वाली, सुंदर, उत्तम कुल में उत्पन्न तथा इस दुर्गम संसार-सागर से तारने वाली श्रेष्ठ भार्या (जीवनसंगिनी) प्रदान कीजिए।
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः। स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति दुर्लभम्॥
हिन्दी भावार्थ: जो मनुष्य इस अर्गला स्तोत्र का पाठ करके दुर्गा सप्तशती महास्तोत्र का पाठ करता है, वह सप्तशती के जप का दुर्लभ और उत्तम फल प्राप्त करता है।
श्री अर्गला स्तोत्र के पाठ का विशेष फल एवं लाभ:
श्री हनुमान चालीसा एवं शिव चालीसा
गोस्वामी तुलसीदास जी विरचित संपूर्ण 40 चौपाई, दोहा एवं आध्यात्मिक फलश्रुति।
श्री हनुमान चालीसा
रचयिता: गोस्वामी तुलसीदास जी
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बन्दन॥
बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्र के काज संवारे॥
लाय संजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डर ना॥
आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥
नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥
चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥
साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥
तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥
अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥
और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
नित्य 1 या 7 बार पाठ करने से भय, भूत-प्रेत बाधा, असाध्य रोग और शनि की साढ़ेसाती दूर होती है। अष्टसिद्धि और नवनिधि का आशीर्वाद मिलता है।
🕉️स्तोत्र एवं चालीसा पाठ का आध्यात्मिक महत्व व नियम
स्तोत्र (Stotram) का महत्व:
'स्तोत्र' शब्द संस्कृत के 'स्तु' धातु से बना है, जिसका अर्थ है ईश्वर के दिव्य गुणों, शक्तियों और रूपों की स्तुति करना। अर्गला स्तोत्रम् में "अर्गला" का अर्थ होता है किवाड़ या अर्गला (कवच)।
इस स्तोत्र का नित्य पाठ करने से जीवन की समस्त बाधाएं, भय और शत्रु-बाधा नष्ट होती है तथा रूप (आत्मिक तेज), विजय (सफलता) और यश की प्राप्ति होती है।
चालीसा (Chalisa) का महत्व:
चालीसा में 40 चौपाइयां होती हैं जो अवधि भाषा में रची गई हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने कलयुग में भक्तों की रक्षा के लिए हनुमान चालीसा की रचना की थी।
"जो सत बार पाठ कर कोई, छूटहि बंदि महा सुख होई।" प्रतिदिन 7, 11 या 100 बार हनुमान चालीसा का पाठ करने से असाध्य रोग, अकाल मृत्यु का भय और शनि-दोष तत्काल दूर हो जाते हैं।
