आरती संग्रह • Aarti Sangrahबुधवार, गुरुवार एवं जन्माष्टमी
भगवान श्री कृष्ण जी की आरती
"आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की। गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला॥"
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आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की।
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला॥
श्रवण में कुण्डल झलकाता, मुकुट पर चन्द्रिका सोहे।
गगन सों सुमन बरसत हैं, देखि छवि नैन जन मोहे॥
चरण सों निकसी गंगा, जिसे कहते हैं सुरगंगा।
कि जिसने सारी दुनिया में, बहाई ज्ञान की गंगा॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की॥
जहां से प्रगट भई गंगा, कलुष कलिहारिणी गंगा।
स्मरण ते होत भव भंगा, बसी शिव शीश जटा के तट॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की॥
कनकमय मुकुट सिर सोहे, त्रिभंगी चाल चित मोहे।
मुरली की तान सुनकर के, सुध-बुध ब्रज-नारि खोवे॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की॥
